श्री लक्ष्मी महात्म्य वृत्त कथा





गुरुवार को माता लक्ष्मी की कथा सुनने से मन की इच्छा पूर्ण होती है, धन की प्राप्ति होती है, संतान दीर्घायु होती है तथा दुःख दारिद्रय नष्ट होता है |

श्री लक्ष्मी विविध रूपिणी हैं | लक्ष्मीजी के अनेक नाम हैं; कैलाश में रहने वाली पार्वती, क्षिराब्धि की सिन्धुकन्या, स्वर्ग की महालक्ष्मी, भूलोक में रहने वाली लक्ष्मी, ब्रम्हलोक की सावित्री, गोलोक की राधिका, वृन्दावन में रहने वाली राजेश्वरी, चन्दन वन की चंद्रा, चम्पक वन की विरजा, पद्मवन की पद्मावती, मालती वन की मालती, कुंदनवन की कुंदर्दाती, केतकी वन की सुशीला, कन्दब वन की कन्दब माला, राजगृह में रहने वाली राजलक्ष्मी और घर घर की गृहलक्ष्मी ऐसे विविध रूप से और विविध नाम से लक्ष्मी देवी प्रसिद्ध हैं |

ऐसी महालक्ष्मी की यह कहानी है | सौराष्ट्र देश की,द्वापर युग की | वहां भद्रश्रवा नाम का राजा राज्य करता था | वह पराक्रमी था | चार वेद, छः शास्त्र, अठारह पुराण आदि का इन्हें ज्ञान था | उनकी रानी का नाम था सूरतचन्द्रिका | वह लावण्यमयी, सुलाक्षनी और पतिव्रता थी | उस दम्पति की आठ संताने थी | सात पुत्र और एक कन्या | कन्या का नाम था शामबाला | एक दिन श्री लक्ष्मी जी के मन में आया की राजा के राजगृह में जाकर निवास करें, जिसके कारण राजा अपनी प्रजा को अधिक सुख देगा | गरीब के घर अगर मै रहूँ तो वह सारी धन संपत्ति खा लेगा | इसलिए लक्ष्मीजी ने वृद्ध ब्राह्मिण स्त्री का रूप लिया | हाथ में आधार के लिए एक लकड़ी ले ली और उसका सहारा लेते लेते वे सूरत चन्द्रिका रानी के महल के दरवाजे में खड़ी हो गयी | उन्हें देखकर रानी की एक सेविका सामने आ गयी | उसने उस वृद्धा स्त्री की पूछताछ की | वृद्धा ने अपना नाम, पति का नाम, रहने का स्थान आदि समुचित जानकारी दे दी | वृद्धा स्त्री के रूप की लक्ष्मी माता कहने लगी- "मेरा नाम है कमला, पति का नाम भुवनेश, हम लोग द्वारका में रहते हैं | तुम्हारी रानी पूर्वजन्म में एक वैश्य की पत्नी थी | वह वैश्य बहुत दरिद्र था, हर दिन दोनों में लड़ाई हो जाती | उसका पति उसे बहुत मारपीट करता, इस हालत से वह बहुत परेशान हो गयी और घर छोड़कर चली गयी | वन में बिना कुछ खाए-पिए घुमती रही | उसकी यह हालत देखकर मुझे उसकी दया आई | धन संपत्ति देने वाली श्री लक्ष्मी जी की कहानी मैंने उसे सुनाई | मेरे कथानुसार उसने लक्ष्मी वृत्त का पालन किया | लक्ष्मी देवी उससे प्रसन्न हो गयी, उसका दारिद्र्य नष्ट हो गया, संतति संपत्ति से उसका घर भर गया, आनंद हो गया | जितने साल उन्होंने लक्ष्मी वृत्त का पालन किया उतने हजार वर्ष उनको आनंद प्राप्त हुआ| उन्हें राजकुल में जनम प्राप्त हुआ | लेकिन रानी को अब अपने वृत्त का विस्मरण हो गया है | उन्हें स्मरण दिलाने मै यहाँ आई हूँ |" रानी की सेविका ने उनसे लक्ष्मी व्रत की जानकारी पूछी | पूजा विधि की भी जानकारी ली | वृद्धा रूपधारी श्रीलक्ष्मी ने व्रत की जानकारी और महात्म्य का कथन किया | इसके बाद सेविका वृद्धा को धन्यवाद दे रानी को उनका सन्देश देने चली गयी |

राज वैभव में रहने वाली रानी को अपने ऐश्वर्य का बहुत घमंड था, वह उन्मत्त हो गयी थी | वृद्धा का सन्देश सुनकर वह यकायक गुस्से में आ गयी और वृद्ध ब्राह्मिण स्त्री को अपमानित किया, उसके साथ मारपीट भी की | लेकिन वह साक्षात् लक्ष्मीजी का रूप है यह बात रानी को मालूम न थी | रानी का बुरा बर्ताव देखकर लक्ष्मीजी ने वहां रहना पसंद नहीं किया | अपने खुद के निवास में ही रहना पसंद किया | वह वहां से निकली, कुछ ही दूरी पर उन्हें शामबाला मिली | उसे सारी जानकारी मिली | उसने उस वृद्धा स्त्री से क्षमा याचना की तब लक्ष्मीजी को उस पर दया आ गयी | उन्होंने शामबाला को लक्ष्मी व्रत की जानकारी दी | वह दिन मार्गशीर्ष मास का प्रथम गुरुवार था | शामबाला ने भाव भक्ति से लक्ष्मी व्रत का पालन किया | इसकी फल प्राप्ति यह हुई की सिद्धेश्वर नामक राजा के मालाघर नामक पुत्र से उसका विवाह संपन्न हुआ | उसे बड़ा वैभव प्राप्त हुआ | वह अपने पति के साथ राज वैभव में रहने लगी |

इधर लक्ष्मी कोपायमान होने के कारण राजा भाद्र्श्रवा और रानी सूरत चन्द्रिका इनके राज का अस्त हुआ | वैभव ऐश्वर्य का लोप हुआ और उनकी दशा बड़ी शोचनीय हो गयी | एक दिन सूरतचन्द्रिका अपने पति से बोली- "अपनी बेटी का पति राजा है, उसके पास जाओ, अपनी दशा बताओ | उसे दया आएगी और वह कुछ संपत्ति जरुर देगा |"

भद्र्श्रवा शाम बाला के पति के राज्य में गया | एक तालाब किनारे विश्राम के लिए बैठ गया | इतने में शाम बाला की कुछ दासियाँ जलकुम्भ लेकर जल भरने के लिए वहां आई | राजा भद्र्श्रावा को उन्होंने देखा | उन दासियों ने उनके बारे में पूछताछ की | उन्होंने सब कुछ बताया | वह अपनी शाम बाला के ही पिता हैं यह जानने पर दासियाँ दौड़कर शामबाला के पास आई, सारी जानकारी उसे बताई | शामबाला अपने पिताजी को बड़े ठाठबाठ के साथ अपने महल में लायी | उनकी आवभगत की, आदर सत्कार किया | वह जब वापस जाने को निकले तब उसने उन्हें हांडी भर धन भेट किया |

भद्र्श्रवा अपने घर पहुँच गया | सूरत चन्द्रिका को हर्ष हुआ उसने भेंट हांडी खोली | हांडी में धन की जगह कोयला भरा हुआ था | लक्ष्मीजी की कृपा से यह चमत्कार हो गया था |

कुछ दिन बीत गए | अब सूरतचन्द्रिका अपनी बेटी के घर गयी | वह दिन था मार्गशीर्ष मास का अंतिम गुरुवार | शामबाला ने लक्ष्मी व्रत किया था | अपनी माताजी से भी यह व्रत करवाया | सूरतचन्द्रिका अपने घर वापस आ गयी | उसने लक्ष्मी व्रत किया था इसलिय उसे पहले सा वैभव, राजैश्वार्य पुनः प्राप्त हुआ | कुछ दिन शामबाला मायके में आ गयी | लेकिन अपने पिताजी को कोयला दिया यह गुस्सा सुरत्चंद्रिका के मन में था इसलिए वहां शामबाला की कोई पूछताछ नहीं हुई | उसका वहा अनादर हुआ लेकिन वह क्रोधित नहीं हुई | वहां से निकली और निकलते समय कुछ नमक लिया | वापस आने पर पति ने पुछा- "शामबाला ! मायके से क्या लायी ?" तब वह बोली-"राज्य का तथ्यांत सार लेकर आई हूँ |" पतिदेव बोले-"इसका क्या मतलब?" उसने जवाब दिया-"कुछ दिन ठहरो, सारी बातें समझ में आ जाएगी |" उस दिन उसने भोजन की सारी चीजे बिना नमक के पकाने का आदेश दिया | पति देव को उसने भोजन परोसा, उन्हें नमक के बिना सारे खाद्य पदार्थ रुचिहीन लगे | बाद में उसने भोजन थाल में कुछ नमक रखा, खाद्य पदार्थ में नमक मिलाया तो भोजन रुचिमय लगने लगा | यही है " राज्य का सार " , पति को यह बात समझ में आ गयी |
संक्षेप में, इसप्रकार से जो कोई श्री लक्ष्मी व्रत श्रृद्धा युक्त भाव से करेगा तो उसे लक्ष्मी की प्राप्ति होगी | सुख शांति का लाभ होगा | मनोकामनाएं पूर्ण होगी | लेकिन धन-धान्य प्राप्त होने पर लक्ष्मीजी का व्रत करना न भूले | हर गुरुवार कथा का पठान- श्रवण करें | ऐसी यह श्री लक्ष्मी व्रत की कहानी गुरुवार को सभी को सफलता प्रदान करने वाली हो | शुभ भवतु |

||ॐ श्री लक्ष्मी देवी नमः ||

श्री लक्ष्मी नमनाष्टक


नमस्कार महामये, जगन्माते परत्परे |
शंख चक्र गदा हस्ते, लक्ष्मी माते नमोस्तुते |१|
आदि नहीं अंत नहीं, आद्यशक्ति सचमुच तू |
विश्वधारे विष्णुकांते, लक्ष्मिमाते नमोस्तुते |२|
सर्वव्यापी सर्वसाक्षी, सुद्धसत्वस्वरूपिणी |
सर्वज्ञे सिन्धु सम्भुते, लक्ष्मिमाते नमोस्तुते |३|
कमले कमल्नेत्रे कोमले कमलासने |
मंगले मुदिते मुग्धे, लक्ष्मिमाते नमोस्तुते |४|
शुभ्रवस्त्रधारिणी गरुढ़ध्वज्भामिनी |
दिव्यलंकार भूषिते, लक्ष्मिमाते नमोस्तुते |५|
सर्व दुःख हरे देवी, भुजंग शयननाग्नने |
भगवती भाग्यदासी, लक्ष्मिमाते नमोस्तुते |६|
सिद्धिबुद्धि भुक्तिमुक्ति, संतति शंखसम्प्दा |
आयु आरोग्य देने वाली लक्ष्मिमाते नमोस्तुते |७|
नमोनमः महालक्ष्मी धनवैभवदाय के |
दैन्य हमारे दूर करो, प्रार्थी मिलिंद माधव |८ |
पठन श्रवण भावे नित्य करे नम्नाश्टका |
मनोकामना प्राप्त हो, सत्य श्रृद्धायुक्त भाबुका |९|

श्री महालक्ष्मी देवीजी की आरती


जयदेवी जयदेवी श्री महालक्ष्मी माते, प्रसन्न होकर व्रत दे हमे माते |
श्री विष्णुकांते तू विश्वेश्वरी सत्ता, स्थिरचर धन देगी लक्ष्मीव्रत करता |
जननी तुझ सामान नहीं त्रिभुवन में, सुर वर मस्तक वन्दित तव चरणों में |
कृपा प्रसाद से हो लाभांत सुखशांति, चित्त कलेश हारती माते, नहीं रहती आपत्ति |
वैभव ऐश्वर्य का और अपर धन का, दान देगी दयाले निरंतर सौख्यका |
मिलिंद माधव तुम्हारी करते भावे अर्चन, प्रेम भक्ति भाव से शरणागत हम सब |
जयदेवी जयदेवी श्री महालक्ष्मी माते, प्रसन्न होकर व्रत दे हमे माते |

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